March 3, 2008...2:11 pm

फ्रस्ट्रेशन, गाली या शराबखोरी — मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?

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मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?
१. फ्रस्ट्रेशन
२. गाली-गलोज
३. शराबखोरी

मुझे तो लगता है की मीडिया में ये सभी रस बराबर मौजूद हैं — कहीं कम, कहीं ज्यादा |

फ्रस्ट्रेशन निचली स्तर पर ज्यादा है | काम ज्यादा और पॉवर कम हो तो हो जाता है | फिर अगर पैसे भी कम ही मिलते हों तो सुभान अल्लाह | हिंदीवालों को पैसे की किल्लत कुछ ज्यादा ही होती है | भला हो बिजनेस अख़बारों का, अब पैसे की मार थोडी कम हो गयी है हिंदीवालों पर |

गाली-गलोज तो जैसे बोलचाल की सामान्य बात है | दिल्ली में हों तो फिर आप की तो माँ-बहन एक हो जायेगी | वैसे दिल्ली में माँ-बहन गाली नहीं मानी जाती |

शराब के तो क्या कहने | प्रेस क्लब, सोचा था, वो जगह होती होगी जहाँ बड़े-बड़े पत्रकार और भी बड़ी-बड़ी बातें करते होंगे | पर वो तो एक तरह का शराब खाना है, वो भी एकदम सस्ता सा | पत्रकारों के जेब के हैसीयत में प्रेस क्लब की दारू ठीक बैठती है | और फिर रोज़ गले के नीचे दारू उधेलेंगे तो कितनी महंगी पी सकेंगे | कनाट प्लेस के क्लबों में तो रोज़ जा नहीं सकते|

अगर आप भी मीडिया से हैं, तो बताइयेगा ज़रूर की मेरी बात कितनी सही है |

3 Comments

  • फ्रस्ट्रेशन, चुतियापा या शराबखोरी — मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?

    फ्रस्ट्रेशन, आत्ममुग्धता या शराबखोरी — मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?
    हंस जी वैसे आप मर्जी के मालिक हैं पर मेरे विचार से गाली दें तो फिर ऐसी दें जो साहित्यक हो. आप नाराज मत होना. आत्ममुग्ध या आत्ममुग्धता अपने आप सामने वाले के लिए बहुत निन्दाजनक शब्द होता है. एक बात और क्या आपने अपना ब्लोग हिन्दी के चार फोरम हैं उन पर पंजीकृत कराया हैं कि नही. और अगर नहीं तो कर लें तो और लोग पढेंगे. आप हम मित्र हैं ही और रहेंगे मेरे मित्र कई इन फोरम पर भी हैं. वैसे एक रोचक बात यह है कि आपने जिस विषय पर लिखा है उसी पर आज लिखने का मन था देखता हूँ कि लिखता हूँ कि नहीं.

    दीपक भारतदीप

  • दीपक जी, नमस्कार|
    आप की बात मन कर इस पोस्ट का शीर्षक बदल दिया| अब आगे से कोशिश करूंगा की सभ्य भाषा का इस्तेमाल करूं| सलाह देने के लिए शुक्रिया, और मित्र कहने के लिए और भी ढेर सारा शुक्रिया|

  • शीर्षक बदलने के लेये बहुत-बहुत शुक्रिया। दीपक जी को भी धन्यवाद।

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