आज फुरसतिया पर भटकते हुए ये चिट्ठा पढ़ा| |
मैं ब्लागर क्यों बना
मैं ब्लागर बना क्योंकि :
१. मुझे सोने से नफ़रत है। (जागते रहते हैं इसलिये ब्लागियाते हैं) ![]()
२.मैंने अपनी जिन्दगी के सारे मजे बचपन में ले लिये हैं। (अब जिन्दगी में कुछ मजा बचा नहीं है सो ब्लागर बन गये) ![]()
३. मैं अस्त-व्यस्त(डिस्टर्ब) पारिवारिक जीवन चाहता हूं।(ब्लागिंग के अपरिहार्य साइड इफ़ेक्ट हैं ये ) ![]()
४.मैं अपने आप से बदला लेना चाहता हूं। (दिन-रात बेमतलब खुटुर-खुटुर करने का और क्या कारण हो सकता है) ![]()
५. मैं अपने सबसे अच्छे दोस्तों से दूर होना चाहता हूं। (लिखने, कमेंटियाने, माडरेटियाने, बहसियाने और हें,हें,हें में ही जुटे रहेंगे तो दोस्तों के लिये समय कहां से आयेगा!) ![]()
६.मैं सामाजिक बहिष्कार चाहता हूं। ( मिलेंगे, जुलेंगे नहीं तो कट ही जायेंगे। रही-सही कसर ब्लागिंग के किसी लफ़ड़े में पूरी हो जायेगी।) ![]()
७.मैं छुट्टियों में भी काम करना पसन्द करता हूं।( हफ़्ते भर में जो रह गया उसे छुट्टियों में ठेलने के प्रयास में रहते हैं)
ये तो हुई फुरसतिया के चिट्ठाकारिता के ७ बहने| मेरे मन मी ये सवाल कौंध गया की मैं क्यों लिखता हूँ| आधा-अधूरा ज़वाब ये रहा:
१. लिखता हूँ लिखने के लिए| लिखना भी एक बीमारी है| लग जाय तो छूटे नही छूटती|
२. ऑफिस में टाइम पास करने के लिए| कम नही हो तब भी खुट-खुटाते रहिये| लोगों को लगेगा के आप काम कर रहे हैं|
३. बकवास करने के लिए| वैसे आम लोगों के पास आपकी बकवास सुनने का समय तो रहता नहीं|
४. भड़ास निकलने के लिए| जो मर्जी बोलिए| किसी को बुरा लगे तो मेरे बला से|
५. रात भर जगने के लिए| वैसे असल मे ये उल्टा हैं| लिखना होता है इसलिए जागना पड़ता है|
बाकी फुरसतिया के जो कारण हैं वो मेरे लिए भी सही बैठते हैं| ![]()
4 Comments
March 5, 2008 at 7:55 am
प्रीतम जी
मेरा अंदाजा गलत नहीं था. आप बहुत अच्छा लिखते हैं और लगता है कि आप इस हिन्दी ब्लोग जगत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं. लिखते रहिये. क्या आपका यह ब्लोग नारद और ब्लोग्वानी पर दिख रहा है.आपके विषय देखकर लगता है कि आप दिलचस्प लिखते हैं.
दीपक भारतदीप
March 5, 2008 at 12:09 pm
दीपक जी, तारीफ के लिए शुक्रिया| अच्छा तो नही पर ठीक-ठाक लिख लेता हूँ, वो भी आपलोगों की नक़ल करके|
नारद पर मेरा ब्लॉग है, वहाँ से कुछ लोग आए थे| ब्लोग्वानी का कुछ पता नही|
March 5, 2008 at 6:37 pm
सही है। आफ़िस में फ़ुरसत मिले तो फ़ुरसतिया लिखें।
March 6, 2008 at 1:41 am
फुरसत न भी मिले तो भी लिखिए| काम के समय में कटौती कर के लिखिए| घर पर लिखिए| कोई ऐसे ही फुरसतिया बन जाएगा का| जबरिया लिखना पड़ेगा|
Leave a Reply