June 13, 2008
Wish I were there…
March 9, 2008
मुझे वर्डप्रेस पसंद है
हिन्दी मैं ब्लॉग करने के लिए दो ही जगह हैं — ब्लागस्पाट और वर्डप्रेस|
ज्यादातर लोग ब्लागस्पाट पर लिखते हैं| शायद इसलिए की उसे ज्यादा लोग जानते है| वर्डप्रेस पर चिठ्ठे लिखने वाले थोड़े कम हैं — शायद ब्लागस्पाट की अपेक्षा बहुत ही कम| और एक बात ये भी है की ब्लागस्पाट आप में गूगल टूल का इस्तेमाल उसके पोस्ट वाले पन्ने पर ही कर सकते हैं| अलग से गूगल ट्रांस्ल्ट्रेशन का पन्ना खोल कर टाइप करने, और फिर वहाँ से कॉपी कर के पोस्ट वाले पन्ने पर चिपकाने की ज़रूरत नही| फिर वह आप एडसेंस [विज्ञापन] भी आसानी से लगा सकते हैं| कोई चाहे तो अलग से कोड [HTML के कोड] भी लगा सकता है|
वर्डप्रेस मैं ये सब सुविधाएँ नही हैं| कोई कोड नही लगा सकते| सर्वर की सुरक्षा के लिए बहुत से रोक-टोक हैं| पर इस सबके वावजूद वर्डप्रेस मुझे पसंद है| अपनी मर्जी के ब्लॉग टेम्प्लेट [ब्लॉग का डिजाईन] लगा सकते हैं, पसंद के विजेट [अलग-अलग कार्य करने वाले ब्लॉग के टुकड़े] लगा कर अपने मर्जी का ब्लॉग बना सकते हैं| इसके साथ ही वर्डप्रेस में आप को पता चलता है की कितने लोगों ने ब्लॉग देखा, कौन से शब्द सर्च कर के आपके ब्लॉग पर आया, ब्लॉग पर किन लिंक्स पर लोगों ने क्लिक किया| स्पैम [अनचाही] टिप्पणियों को वर्डप्रेस अलग कर देता है, जो ब्लॉग को साफ सुथरा रखने के लिए बहुत ही आच्छा है|
मुझे तो वर्डप्रेस पसंद है क्यों की इससे मुझे मिलती है ज्यादा कन्ट्रोल| जब कभी विज्ञापन लगाने के लायक पेज हिट्स [पाठक] हो जायेंगे अपने वर्डप्रेस ब्लॉग को ख़ुद के सर्वर पर शिफ्ट कर दूँगा| तब तक के लिए — साफ सुथरी ब्लोग्गिंग|
पर एक बात का मुझे बेहद अफ़सोस है की वर्डप्रेस पर हिन्दी ब्लोग्स बेहद कम हैं| पता नही सौ भी हैं की नहीं|
March 8, 2008
ब्लागस्पाट का सर्वर डाउन
रात के ११:३५ बज रहे हैं| मैंने सोचा थोड़ा ब्लॉग व्लोग पढ़ लिया जाए| यही सोच कर मोहल्ला का लिंक क्लिक्क किया| और ये ५०२, यानी की सर्वर डाउन| मेसेज आ रहा है की ३० सेकेंड बाद कोशिश करें| सोचा भड़ास देखें| वही सूचना — ५०२ सर्वर अस्थायी रूप से कार्य नही कर रहा| ५ मिनट बाद फिर कोशिश की | वही नतीजा| अगले ५ मिनट बाद भी वही समस्या|
पता नही गूगल ब्लागस्पाट का सर्वर काब से ख़राब है और कितनी देर तक ख़राब रहेगा |
आगे का हाल भी लिखूगाँ|
अपडेट:
११:५१ पर ब्लागस्पाट काम करने लगा|
११:५७ पर भी ब्लागस्पाट पूरी तरह से ठीक नही हुआ है| ५०२ का संदेश आ रहा है| बार-बार कोशिश करने पर ही ब्लोग्स खुल रहे हैं|
March 7, 2008
कब आया वसंत
वसंत पंचमी कब थी? कब आया वसंत? क्या आ कर चला गया वसंत? एक तो दिल्ली मे मुझे वसंत का पता नही चलता उसपर से जॉब ऐसे की ट्यूब लाईट की रोशनी में शाम से आधी रात तक काम करते रहिये| पता कैसे चले की वसंत आया या नही| कैसे मिलूँ वसंत से? हाँ, कोई बताएगा की आम के बगीचों मे मंजर की भीनी सुगंध फैली की नही| सम्भव हो तो पैक कर के कुरिएर कर देंगे आम के मंजरों की भीनी सुगंध?
March 6, 2008
चिठ्ठा-चोर! मेरा भी चिठ्ठा चुराओ| प्लीज़
चोरी हो गयी, चोरी हो गयी| सभी खुशी से चिल्ला रहे हैं| और मैं कुढ़ रहा हूँ|
चोरी होने पे खुशी?
हाँ, चिट्ठे चोरी होने के खुशी| खुशी इस बात की कि लोग चिट्ठे पसंद कर रहे हैं, तभी तो चोरी हो रही है| चिट्ठे चोरी होना गर्व कि बात है| ये सर्टिफिकेट है कि ब्लॉग अच्छा है– कम से कम चिटठा-चोर की नज़र मे|
लोग खुशी खुशी बता रहे हैं — मेरा चिटठा चोरी हो गया, मेरा भी, मेरा भी कह रहे हैं| पर सभी परेशान होने का ढोंग करना नही भूलते| लोगों से पूछते हैं क्या करें| जैसे कि बिल्कुल ही नादान है| अरे भाई, जाएई थाने और लिखाईए रपट| ज़रुरत पड़े तो कीजिये थानेदार कि मुठ्ठी गरम| अदालत में मुकदमा कीजिये और हर्जाना मांगिये| टीवी वालों को बतलाएये कि किसने चुरा लिया आपका चिटठा| सेन्सेशन क्रिएट कीजिये| और हिट हो जाएये|
पर नही, लोग चिठ्ठी पर ही लिख रहे है — चिठ्ठा चोरी हो गया| अरे भाई कहीं चिठ्ठा चोरी होने कि घोषणा वाला चिठ्ठा भी चोरी न हो जाए|
वैसे कुछ लोग चोरों के प्रति काफी सहनुभूती रखते हैं तभी तो चिठ्ठा चोरी हो गया, इसके अलावा और कुछ नही बताते| किसने चुराया, क्यों चुराया, क्या कोई खानदानी दुश्मनी थी, क्या आपके दादा-परदादा ने कभी उनकी कोई मुर्गी चुराई थी — कुछ भी नही बताते| और तो और ये भी नही बताते कि कौन सा चिठ्ठा चोरी हो गया| बस चोरी हो गया| हम भी बड़े साब बन गए|
मेरा चिठ्ठा कोई भी नही चुराता| अभी हिन्दी में नया-नया लिखना शुरू किया है शायद इसलिए| पर बिना चिठ्ठा चोरी हुए काम कैसे चलेगा| सोचता हूँ खुद ही चिठ्ठा चोरी करने का इंतज़ाम कर लूँ| किसी मित्र को कह देता हूँ — यार मेरा चिठ्ठा चोरा ले| दोस्ती कि खातिर| कोई नही मन तो खुद ही एक दूसरा ब्लॉग बना कर अपना चिठ्ठा चूराना शुरू कर दूँगा| भाई आगे बढ़ने के लिए तो लोग क्या-क्या नही करते| मैं तो सिर्फ़ चिठ्ठा चुराऊंगा, वो भी अपना|
March 6, 2008
हिन्दी, अंग्रेज़ी टंकण सीखें
क्या आप टंकण (टाइपिंग) सीखना चाहते हैं? या फिर टाइपिंग का अभ्यास करना चाहते हैं? अगर हाँ, तो अंग्रेज़ी और हिन्दी दोनों मे ही टाइपिंग सिखाने वाली एक प्रोग्राम है — आसन टाइपिंग| हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों मे ही टाइपिंग सीखने वाली इस प्रोग्रम्म से आप चाहें तो फायदा उठा सकते हैं| सरकार की तरफ़ से साल-दो साल पहले एक सीडी (CD) बाँटीं जा रही थी, उसमे ये भी एक प्रोग्राम था| काफ़ी काम की चीज़ है| इस पर मैंने MouseBlog पर एक पोस्ट लिखा था वो काफी लोग पढ़ने आते हैं| आप भी वहाँ से इसके बारे मैं ज्यादा जानकारी ले सकते हैं और प्रोग्राम सेभ कर सकते हैं|
March 5, 2008
भड़ास-मोहल्ला विवाद! कम से कम होली तक चालू रखिये
महाभारत चल रहा था की अचानक युद्ध समाप्ति का बिगुल बज उठा| सफ़ेद झंडे-सा कुछ दिखने लगा| धत तेरे की| सारा झगड़ा ही ख़त्म हो गया| पिक्चर ख़त्म| पर “The End” तो हुआ ही नहीं|
मैं यही सब सोच रहा था जब भड़ास पर पढ़ा “विवाद के अंत के बाद–कुछ झलकियाँ”| मन मसोस कर सोचा चलो अच्छा हुआ| रोज़-रोज़ की मारा मारी खत्म हुयी| पर गम कम न था| इतना अच्छा मनोरंजन का साधन जो था ये विवाद| वैसे वाद-विवाद बहुत ही अच्छी चीज़ होती है| तभी तो स्कुल-कालेजों मे होती रहती है वाद-विवाद प्रतियोगिताएं|
पर ये क्या| विवाद के खात्मे की पोस्ट को लेकर ही विवाद हो गया| विवाद का विषय–विवाद से किसने कितना कमाया| भड़ास वाले यशवंत जी कह रहे हैं की बहुत कमाई हो गयी, और मोहल्ले वाले अविनाश जी चार डॉलर की कमाई दिखा रहे हैं| अब कैसे पता चले की सच क्या है–डॉलरों की बरसात या फिर चार डॉलर| कहीं अविनाश जी इनकम टैक्स वालों के डर से तो नहीं छुपा रहे| ठीक भी है| क्या पता कोई मुखबिर ख़बर कर दे, या फिर वो ख़ुद ही देख लें|
अविनाश जी, यशवंत जी, आप दोनों मुझे चुपके से बता दीजिये कितनी कमाई हुई| कसम! मैं किसी को नहीं बताऊंगा, इनकम टैक्स वालों को तो बिल्कुल भी नहीं|
कहीं ऐसा तो नही की कमाई करने के लिए आप दोनों ने ये महाभारत रचा है| वैसे टीवी वाली महाभारत भी अच्छी कमाई कर रही होगी|
जो भी हो, ये महाभारत चालू रखियेगा| कम से कम होली तक| मज़ा आयेगा|
March 5, 2008
मैं चिट्ठे लिखता क्यों हूँ?
आज फुरसतिया पर भटकते हुए ये चिट्ठा पढ़ा| |
मैं ब्लागर क्यों बना
मैं ब्लागर बना क्योंकि :
१. मुझे सोने से नफ़रत है। (जागते रहते हैं इसलिये ब्लागियाते हैं) ![]()
२.मैंने अपनी जिन्दगी के सारे मजे बचपन में ले लिये हैं। (अब जिन्दगी में कुछ मजा बचा नहीं है सो ब्लागर बन गये) ![]()
३. मैं अस्त-व्यस्त(डिस्टर्ब) पारिवारिक जीवन चाहता हूं।(ब्लागिंग के अपरिहार्य साइड इफ़ेक्ट हैं ये ) ![]()
४.मैं अपने आप से बदला लेना चाहता हूं। (दिन-रात बेमतलब खुटुर-खुटुर करने का और क्या कारण हो सकता है) ![]()
५. मैं अपने सबसे अच्छे दोस्तों से दूर होना चाहता हूं। (लिखने, कमेंटियाने, माडरेटियाने, बहसियाने और हें,हें,हें में ही जुटे रहेंगे तो दोस्तों के लिये समय कहां से आयेगा!) ![]()
६.मैं सामाजिक बहिष्कार चाहता हूं। ( मिलेंगे, जुलेंगे नहीं तो कट ही जायेंगे। रही-सही कसर ब्लागिंग के किसी लफ़ड़े में पूरी हो जायेगी।) ![]()
७.मैं छुट्टियों में भी काम करना पसन्द करता हूं।( हफ़्ते भर में जो रह गया उसे छुट्टियों में ठेलने के प्रयास में रहते हैं)
ये तो हुई फुरसतिया के चिट्ठाकारिता के ७ बहने| मेरे मन मी ये सवाल कौंध गया की मैं क्यों लिखता हूँ| आधा-अधूरा ज़वाब ये रहा:
१. लिखता हूँ लिखने के लिए| लिखना भी एक बीमारी है| लग जाय तो छूटे नही छूटती|
२. ऑफिस में टाइम पास करने के लिए| कम नही हो तब भी खुट-खुटाते रहिये| लोगों को लगेगा के आप काम कर रहे हैं|
३. बकवास करने के लिए| वैसे आम लोगों के पास आपकी बकवास सुनने का समय तो रहता नहीं|
४. भड़ास निकलने के लिए| जो मर्जी बोलिए| किसी को बुरा लगे तो मेरे बला से|
५. रात भर जगने के लिए| वैसे असल मे ये उल्टा हैं| लिखना होता है इसलिए जागना पड़ता है|
बाकी फुरसतिया के जो कारण हैं वो मेरे लिए भी सही बैठते हैं| ![]()
March 3, 2008
फ्रस्ट्रेशन, गाली या शराबखोरी — मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?
मीडिया में क्या सबसे ज्यादा है?
१. फ्रस्ट्रेशन
२. गाली-गलोज
३. शराबखोरी
मुझे तो लगता है की मीडिया में ये सभी रस बराबर मौजूद हैं — कहीं कम, कहीं ज्यादा |
फ्रस्ट्रेशन निचली स्तर पर ज्यादा है | काम ज्यादा और पॉवर कम हो तो हो जाता है | फिर अगर पैसे भी कम ही मिलते हों तो सुभान अल्लाह | हिंदीवालों को पैसे की किल्लत कुछ ज्यादा ही होती है | भला हो बिजनेस अख़बारों का, अब पैसे की मार थोडी कम हो गयी है हिंदीवालों पर |
गाली-गलोज तो जैसे बोलचाल की सामान्य बात है | दिल्ली में हों तो फिर आप की तो माँ-बहन एक हो जायेगी | वैसे दिल्ली में माँ-बहन गाली नहीं मानी जाती |
शराब के तो क्या कहने | प्रेस क्लब, सोचा था, वो जगह होती होगी जहाँ बड़े-बड़े पत्रकार और भी बड़ी-बड़ी बातें करते होंगे | पर वो तो एक तरह का शराब खाना है, वो भी एकदम सस्ता सा | पत्रकारों के जेब के हैसीयत में प्रेस क्लब की दारू ठीक बैठती है | और फिर रोज़ गले के नीचे दारू उधेलेंगे तो कितनी महंगी पी सकेंगे | कनाट प्लेस के क्लबों में तो रोज़ जा नहीं सकते|
अगर आप भी मीडिया से हैं, तो बताइयेगा ज़रूर की मेरी बात कितनी सही है |
March 3, 2008
बहुत हो गयी अंग्रेज़ी
बहुत दिनों से ब्लोग्स लिख रहा हूँ | कभी यहाँ, तो कभी वहाँ | पिछले कुछ दिनों से वर्डप्रेस को आपना ठिकाना बनाया है |
जब से हिन्दी ब्लोग्स पढ़ना शुरू किया है, देख रहा हूँ की लोग-बाग खूब हिन्दी मे ब्लॉग कर रहे हैं | अब रहा नही जाता | अभी तक तो इस ब्लोग पर अंग्रेज़ी मे ही लिखता था पर अब आगे से यहाँ हिन्दी चला करेगी | वैसे भी मैने अंग्रेज़ी के लिए नया ब्लॉग तो शुरू कर ही लिया है |
तो लो भइया हम शुरू हो गए, और लगा ली हैं ताल | उँगलियाँ दातों तले दबंगी की नहीं ये तो आगे चल कर ही पता चलेगा | देखते हैं आगे क्या होता है |
नोट: इस पोस्ट को लिखने मे अच्छी मशक्कत करनी पड़ी | गूगल को मेरे हिन्दी पूरी तरह समझ मे नही आती |




